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गुलाबी गैंग बनाम गुलाब गैँग : हिंदी सिनेमा की रोचक पहल



March 1, 2014 12:54:31 IST
updated March 1, 2014 14:58:16 IST
By नलिन, Glamsham Editorial
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शायद पहली बार ऐसा हुआ होगा हिंदी सिनेमा के इतिहास में, के एक ही कथानक पर दो फिल्में बनाई गयी हैं और दोनों ही फिल्में काफी कम समय के अंतराल के बीच में सिनेमाहॉल में रिलीज़ हुई हैं ! जी हाँ, गुलाबी गैंग जो कि एक डॉक्यूमेंट्री है और पहले रिलीज़ हो गयी है और गुलाब गैंग जो कि इसी कथानक का एक सिनेमेटिक रूप है। दरअसल गुलाब गैंग नामक पहल जो कि मध्य भारत के ग्रामीण इलाकों - विशेषतः बुंदेलखंड के इलाके में जो विकास के पैमानों के हिसाब से आज भी बहुत पिछड़ा हुआ है- को शायद इस तरह के फोकस की जरूरत थी, क्योंकि महिला जाग्रति के लिए, विशेषतः, जहाँ इस गैंग ने प्राचीन मान्यताओं को चुनौती दी है, इस प्रयास को एक डॉक्यूमेंट्री के कलेवर से इसका ऐतिहासिक स्वरुप कालजयी कर दिया गया है, और दूसरी तरफ गुलाब गैंग के माध्यम से इस पहल को एक ब्रांड के रूप में शायद स्थापित किया जा सकता है, और प्रेरणा ली जा सकती है हिन्दुसतान के अन्य इलाकों में, विशेषतः ग्रामीण इलाकों में महिलाओ द्वारा पारम्परिक व्यवस्थाओ के खिलाफ बग़ावत के लिए और अपनी पहचान बनाने के लिए।

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गुलाब गैंग वास्तव में एक आम आदमी की पहल है अपने वजूद और अस्तित्व के लिए, या शायद यूं कहें एक आम औरत के संघर्ष और अपना मकाम हासिल करने की कहानी है, और इस समय जबकि देश में चुनाव का माहौल गर्मी पकड़ रहा है, माधुरी दीक्षित अभिनीत गुलाब गैंग, जिसमे जूही चावला पहली बार एक नकारात्मक भूमिका में हैं, देश की राजनीती में जो उबाल आ रहा है उसको और परवान चढ़ा सकता है.

गुलाब गैंग वास्तव में एक प्रस्तुति है व्यवस्था को चुनौती देने के प्रयास की, जूही चावला पारम्परिक व्यस्था का प्रतिनिधित्व करते हुए, जबकि माधुरी दीक्षित स्थापित व्यवस्थायों को चुनौती देती हुई पात्र की भूमिका में। हिंदी सिनेमा में बहुत कम ही हुआ है कि इस तरह की सामाजिक पहलों को एक वाणिज्यिक स्तर पर चित्रित किया जाए और इस पहल को विश्वासप्रद बनाने कि लिए माधुरी दीक्षित और जूही चावला जैसे कलाकारों की जरूरत थी। हालांकि इस विषय पर 2006 में एक डाक्यूमेंट्री बन चुकी है जिसको ब्रिटेन की महिला फ़िल्म निर्मात्री किम डोलिगंतों ने बनाया था, और इस विषय पर एक किताब भी लिखी जा चुकी है, पर इस विषय को महत्ता दिलाने में शायद इस तरह के वाणिज्यिक पहल की जरूरत थी।

यहाँ पर एक सवाल यह उठ सकता है कि अगर यह पहल एक सकारात्मक पहल थी तो फिर इस पहल को एक ' गैंग ' के नाम से क्यों प्रस्तुत किया जाता है ? दरअसल ' गैंग ' नाम की पृस्ठभूमि में अगर हम जाएं तो गैंग पारिभाषित करता है एक दर, एक खौफ को, और गुलाब गैंग की पहल वास्तव में ऐसी है जिसने एक खौफ सा पैदा कर दिया है उन लोगो के लिए, जो कि महिलाओं के विरुद्ध अत्याचार को अपना हक़ मानते हैं।

उम्मीद यही की जाती है कि इस तरह की पहल को सिनेमा के परदे पर साकार करने की जो पहल माधुरी दीक्षित और जूही चावला में उठाई है, वो इस प्रयास को और आगे ले जायेंगे। पूरे हिंदुस्तान में इस तरह की सकारात्मक पहलों की भरमार हैं, जरूरत हैं उनको सिनेमा के परदे के माध्यम से आम जन-मानस के बीच लाने की, और उसको विश्वासप्रद बनाने के लिए माधुरी और जूही जैसे ब्रांड अम्बैस्डर की।

GULABI GANG
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